Dissociative States के साथ-साथ OCD से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें

(Carol Edwards द्वारा लिखित एवं गौरव कुण्डू द्वारा अनुवादित एक लेख)

Note: This is just an excerpt from one of the articles written by Carol Edwards who is well known for her expertise in the field of Cognitive Behavioural Therapy and OCD. She can be contacted through this link. The translation will be updated on a regular basis so stay connected and keep an eye on your mail. Subscribers of this blog will be mailed on any kind of update immediately.

विषय - सूची
  • Depersonalisation-Derealisation
    Dissociative Amnesia
    Identity Confusion
    Asperger’s Syndrome and Depersonalisation
    Dissociation is not Schizophrenia
    Fugue
    Treatment
    Cognitive Behavioural Therapy
    Forming a Hierarchy (for exposure response prevention)
    Family and Friend Collusion
    Alternative Statements (in place of reassurance ones)
    Emotion Regulation Strategy
    Tackling Thinking Errors
    SSRI Intervention
    Enhanced Techniques for People Living with Asperger’s and Depersonalisation
    Summary

पृथक्करण (Dissociation ) शब्द अक्सर उन घटनाओं का वर्णन करने के लिए प्रयोग किया जाता है जब किसी व्यक्ति को यह प्रतीत होता है कि उसका शरीर मानो उसका नहीं है ( इसे depersonalisation भी कहते हैं ) | यह उस अनुभव के बारे में बताता है जब किसी व्यक्ति को अन्य लोग, वस्तुएँ एवं परिस्थितियाँ और यहाँ तक कि सारा संसार झूठा लगने लगता है ( इस अवस्था को derealisation भी कहा जाता है ) | Dissociation से जुड़े अनुभव के बारे में लोग बताते हैं कि उन्हें ऐसा महसूस होता है जैसे वे खुद से और अपने आस-पास के माहौल से जुदा हो चुके हैं |

पृथक्करण के लक्षण चिंता एवं तनाव से जुड़े होने के लिए भी जाने जाते हैं | मानसिक आघात तथा बुरे बर्ताव इसके कारण हो सकते हैं हालाँकि कुछ लोग इस बात की पुष्टि नहीं करते |

Fiona बताती हैं,” मेरा बचपन काफी खुशनुमा था और मेरे माता-पिता मुझसे बेहद प्यार करते थे | वे मेरे समर्थक भी थे | किन्तु जैसे ही मैंने अपनी की पढाई पूरी की और नौकरी शुरू की मुझे अजीब सी “out-of-body” की अनुभूति हुई | एक बार जब मैं अपने दोस्तों के साथ खाना खा रही थी तो अचानक मुझे ऐसा लगा मानो मैं एक समीक्षक की भाँती सारी घटना को दूर से देख रही हूँ | ” Fiona को इस बात को जानने की तीव्र इच्छा हुई कि वास्तव में आखिर हो क्या रहा था |
“मुझे ऐसा लगने लगा जैसे मेरे हाथ, पैर और सिर मेरे शरीर से मानो अलग हो गए हो | सारा समय में अपने हाथो और पैरो को चिकोटी काटती रही ताकि जान सकू मैं सही अवस्था में तो हुँ या नहीं |

Billy बताते हैं ” मेरे साथ तो यह सब अजीब सी मायूसी भाव के लहर ले आता है | मैं दूसरों से जुड़ना तो चाहता हूँ लेकिन ऐसा हो नहीं पाता | मुझे ऐसा प्रतीत होता है जैसे कुछ भी वास्तविक नहीं है ( derealisation )| बालावस्था में मैं काफ़ी अकेला-सा महसूस करता था | एक से दूसरे पालनगृह आने-जाने के दौरान लोगो से मेरा सम्पर्क टूटता चला गया | मेरे जीवन में उनका साथ काफी अल्प समय के लिए ही रहता था | आज मैं ज़िन्दगी के तीसरे दशक में प्रवेश कर चुका हूँ लेकिन किसी से मित्रता करने में या यह विश्वास करने में कि, मेरी संभावित गर्लफ्रेंड मुझे छोड़कर नहीं जाएगी, काफ़ी मुश्किल प्रतीत होता है | कुछ भी सच्चा नहीं लगता और यहीं वजह है कि मैं दोस्ती-यारी या प्रेम-संबंधो के चक्कर में नहीं पड़ता | कभी-कभी तो मैं अपने मायूसी के भाव को भी महसूस नहीं कर पाता लेकिन मुझे यकीन है कि वो मेरे अंदर कहीं न कहीं तो है |”

Maria बताती हैं ” मेरी परवरिश एक ऐसी बहन के साथ हुई जो autism का शिकार है | हम दोनों ने अनेको खुशियों के पल साथ में बिताए और एक बहन होने के नाते मुझे हमेशा से यही लगा कि मैं उसके साथ रहूं | इस बात से कोई ज़्यादा फ़र्क़ भी नहीं पड़ा कि वह autism से जूझ रही थी आख़िरकार है तो वह मेरी सगी बहन ही लेकिन समय के साथ-साथ रिश्तों में बदलाव आने शुरू हो गए | ऐसा प्रतीत होने लगा जैसे मैं उसकी द्वितीय माँ की भूमिका निभा रही थी | मैंने उसे खाना बनाना सिखाया, मैं ही उसे शॉपिंग करने बाहर लेकर जाती थी और जब वह किसी चीज़ से भयभीत होती तो मुझे ही उसके बारे में बताती | यहाँ तक कि जब वह अवसाद के दौर से गुज़र रही थी तो सबसे ज़यादा मुझे ही उसकी फ़िक्र होती थी | दूसरे शब्दों में मैंने उसके लिए वो सब कुछ किया जो एक माँ अपने बच्चे के लिए करती है | जब कभी मैं अपने सहेलियों के साथ बाहर खेलने जा रही होती तो वह मुझे घर में ही रोक लेती और जिद्द करती कि उसके साथ घर में ही समय व्यतीत करूँ और बहुत बार मैंने किया भी |
आज भी याद है कि कैसे वो हमारे माता – पिता का ध्यान अपनी ओर केंद्रित करने की कोशिश करती और दूसरी ओर मैं अपने स्वयँ के पहचान के लिए सारा जीवन असमंजस में पड़ी रही क्यूंकि हर वक़्त तो मेरा ध्यान उसके ही परेशानियों के इर्द गिर्द घूमता रहता था| जो भी समस्याएं थी उनका निवारण जिस प्रकार से होना चाहिए था वैसे हुआ नहीं और इसके पीछे मेरे पिताजी का भी हाथ था | वो हमें हमेशा मानसिक रूप से प्रताड़ित करते थे | दोस्त भी घर इसीलिए नहीं आना चाहते थे क्यूंकि पिताजी का बर्ताव अच्छा नहीं था | माँ ने इन सब के बावज़ूद सभी को संभाला लेकिन जब पानी सर से ऊपर जला जाता तो मुझे ही हस्तक्षेप करना पड़ता था | Mental health team को भी सूझ रहा था कि आखिर क्या किया जाए और देखते ही देखते स्थिति बद से बदतर होती चली गयीं | मेरे अकेलेपन का कारण कोई नज़दीकी रिश्तेदार का ना होना भी है|
मेरे भीतर की बैचैनी धीरे धीरे बढ़ती जा रही थी और मन की भड़ास और गुस्से की ज्वाला इतनी ज़्यादा भड़की की आखिरकार मैंने अपने आप को अस्पताल में पाया| मुझे बिलकुल भी समझ नहीं आ रहा था कि वास्तव में मैं हूँ कौन ? गंभीर स्थिति की वज़ह से मैं पूरी तरह से घबरा गयी थी |

वर्तमान समय में मुझे लगता है कि मैं एक व्यक्तित्व से दूसरे व्यक्तित्व में तब्दील होती रहती हूँ और यह काफी भयावह है पर मैं साथ ही साथ सुरक्षित भी महसूस करती हूँ क्योंकि मुझे पता है कि यह मस्तिष्क का एक प्रकार का रक्षात्मक प्रक्रिया है | बचपन की यादें आखों के सामने चलचित्र की भाँति आते रहते हैं, कुछ सत्य घटनाओं पर आधारित रहते हैं तो कुछ काल्पनिक | ऐसे चिंतन मनन की प्रक्रिया कुछ इस प्रकार से चलती है जिसका कोई अंत नज़र नहीं आता |

मुझे आशा है कि एक दिन ऐसा आएगा जब मेरी अपनी वास्तविक पहचान की तलाश समाप्त होगी (हालाँकि मुझे यह तो पता है कि मैं कौन हूँ पर मैं अभी तक यह नहीं जान सकी कि इस विशाल संसार में मैं कहाँ हूँ ) | एक आम जीवन व्यतीत करना मेरी भी इच्छा है | अपनी क्षमताओं के सारी सीमाओं के बावजूद मैं अपना योगदान इस संसार को देना चाहती हूँ ताकि इस बात की प्रसन्नता रहे कि मैं दूसरों की मदद कर पायी | मैं अपनी माँ और बहन से फिर से जुड़ना चाहती हूँ ताकि हम एक दूसरे को अच्छे से समझ सकें और मुझे भरोसा है कि मुझे उन लोगो का भी साथ नसीब होगा जो मुसीबत के वक़्त मेरे साथ होंगे क्योंकि बचपन से आज तक ऐसा कभी हो नहीं पाया और यही वजह है कि मैं किसी से ना तो जुड़ पायी और न हे सच्चे स्नेह की परिभाषा जान पायी |